नई दिल्ली: स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को देश की सर्वोच्च अदालत से भी फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आसाराम की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए यह साफ किया कि सजा पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई जाएगी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस मामले में राजस्थान सरकार को नोटिस जारी कर दो हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है।
मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने आसाराम के वकीलों की दलीलों को सिरे से नकार दिया। आसाराम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने तर्क दिया था कि आसाराम की उम्र 80 वर्ष से अधिक है और वे कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं, इसलिए उन्हें जमानत दी जाए।
इस पर पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल बढ़ती उम्र या बीमारी को जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने मौखिक रूप से स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में ऐसी स्थिति बनती है जहाँ आसाराम के स्वास्थ्य की स्थिति अत्यंत गंभीर होती है या उनके जीवन को कोई खतरा होता है, केवल तभी जमानत पर विचार किया जाएगा। इसके साथ ही कोर्ट ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया है कि उन्हें जेल के भीतर ही सभी आवश्यक चिकित्सकीय सुविधाएं (Medical Facilities) मुहैया कराई जाएं।
यह मामला साल 2013 का है, जब आसाराम पर उनके ही आश्रम में पढ़ने वाली एक नाबालिग छात्रा के साथ दुष्कर्म करने का आरोप लगा था। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद, 25 अप्रैल 2018 को ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
इसके बाद आसाराम ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस साल 27 मई को राजस्थान हाईकोर्ट ने उनकी उम्रकैद की सजा और नाबालिग से दुष्कर्म से जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(एफ) के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा था। हालांकि, हाईकोर्ट ने उन्हें सामूहिक दुष्कर्म और आपराधिक साजिश जैसी कुछ धाराओं से राहत दी थी और सह-आरोपी संचिता गुप्ता उर्फ शिल्पी और शरत चंद्र को बरी कर दिया था। हाईकोर्ट के इसी फैसले को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, जहाँ से उन्हें कोई तुरंत राहत नहीं मिल सकी।
